जेती देखबे तेती संगी, लूटमार अउ दंगा-फसाद हे।
निर्दोष धंधाये जेल मा, अउ अत्याचारी आजाद हे।।
जगा-जगा मा गुटखा बिकत हे, अउ खुलगे हे मयख़ाना।
लइका सियान सबो खावत हे, बिमल सितार खजाना।।
इही नशा के लत मा संगी, होवत सब बर्बाद हे।
जेती देखबे तेती संगी, लूटमार अउ दंगा-फसाद हे।।
देश के हालत हा बिगड़गे, राजनीति के खेल मा।
कानून हा अब खिलवाड़ होगे, दम नइ रहिगे जेल मा।।
जगा-जगा आतंक फैले हे, घर-घर मा होवत विवाद हे।
जेती देखबे तेती संगी, लूटमार अउ दंगा-फसाद हे।।
अबला मन के होवत हे शोषण, दुराचारी मन ताकत हे।
ये कलयुगी रावण के मारे, लइका घलो नइ बाँचत हे।
अपने बीवी लइका ला बेंच, मदिरा के लेवत स्वाद हे।
जेती देखबे तेती संगी, लूटमार अउ दंगा-फसाद हे।।
रचना- गुमान प्रसाद साहू, समोदा (महानदी)
थाना- आरंग, जिला- रायपुर,छत्तीसगढ़
मोबा.- 9977213968,9977313968
दिनांक- 10-06-2006
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