दिन-दिन रात-रात बाढ़त हे,दुनिया मा गा मँहगाई।
मनखे मनके हाल बिगड़गे, होगे निच्चट करलाई।।
पेट भरे मजदूर किसान, दिन-रात मजदूरी करथे।
फेर बाढ़त मँहगाई सेती, उँखर आधा पेट बस भरथे।।
लइका किलिल कालल करथे, होवत हे गा दुखदाई।
दिन-दिन रात-रात बाढ़त हे, दुनिया मा गा मँहगाई।।
एक तो बेकारी के समस्या, ऊपर ले ये मँहगाई हे।
रईस ला तो फरक नइ परे, फेर गरीब के गा करलाई हे।।
जम्मो जिनिस हा महंगा हो गे, का दार अउ का राई।
दिन-दिन रात-रात बाढ़त हे, दुनिया मा गा मँहगाई।।
जिनिस के दाम हा अइसे बाढ़थे, मानो के ये मीटर हे।
सबो जगा भुखमरी फइले हे, का बाहिर अउ का भीतर हे।।
जनता घुना कस पिसात हे, करही कइसे गा भरपाई।
दिन-दिन रात-रात बाढ़त हे, दुनिया मा गा मँहगाई।।
रचना- गुमान प्रसाद साहू ,समोदा (महानदी)
थाना- आरंग, जिला- रायपुर, छत्तीसगढ़
मोबा.- 9977213968,9977313968
दिनांक- 21-01-2009
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