आषाढ़ बुलकगे सावन आगे, तभो ले पानी नइ बरसत हे।
खेती खार हा सुक्खा पड़गे, चिरई चिरगुन सब तरसत हे।।
पानी के आस मा बइठे किसनहा, ये बादर बैरी बिजरावत हे।
नदिया नरवा सब सुक्खा परगे, अउ तरिया घलो सुखावत हे।।
उमड़ घुमड़ के आथे बादर, अउ बिजरी घलो हा करकट हे।
आषाढ़ बुलकगे सावन आगे, तभो ले पानी नइ बरसत हे।।
मुड़ धरके किसनहा बइठे, फसल सबो सुक्खा अइठे।
गरमी कस घाम करत हे, भुइयाँ घलो हा भोंमरा जरथे।।
अकाल झन पड़ जाये आसो, सबो किसान के हिरदे धड़कत हे।
आषाढ़ बुलकगे सावन आगे, तभो ले पानी नइ बरसत हे।।
पानी बिना जइसे मछरी तड़पे, वइसने माटी घलो तड़पत आज हे।
ये नकटा बादर बैरी ला, नइ आवत थोरूक भी लाज हे।।
राम जाने अब का होही, मोर आँखी घलो अब फड़कत हे।
आषाढ़ बुलकगे सावन आगे, तभो ले पानी नइ बरसत हे।।
रचना- गुमान प्रसाद साहू ,समोदा (महानदी)
थाना- आरंग, जिला- रायपुर ,छत्तीसगढ़
मोबा.-9977213968,9977313968
दिनांक- 02-07-2015
Gpsahu2.blogspot.com
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