Tuesday, August 6, 2019

(28) तै काबर भूखा मारत हस

।।काबर भूखा मारत हस।।

ढाई महिना ले सुखा पार के, अब तै पानी डारत हस।
छत्तीसगढ़िया किसान ल भगवन, तैंहर काबर भूखा मारत हस।।

पानी के अगोरा मा धनहा, गरमी ले खाक होगे।
आस लगाये किसान सपना, जरके राख होगे।
बाजू राज म बाढ़ आये हे, फेर इहाँ सुखा पारत हस।
छत्तीसगढ़िया किसान ला भगवन, तै काबर भूखा मारत हस।।1।।

सोचे रहेन आसो फसल होही ता,सब बिगड़े काम बनाबो।
कोनो बेटी के करबो बिहा, कोनो घर ला अपन बनाबो।
सबो के सपना सपना रहिजाय, अइसन तै कर डारत हस।
छत्तीसगढ़िया किसान ला भगवन,तैं काबर भूखा मारत हस।।2।।

भूखमरी छा जा ही इहाँ, तैंहर पानी अगर नइ बरसाबे।
अब तो हद बाहिर होगे, अउ तैं हर कतका तरपाबे।
जियें के आस टूट जाही सबके, अतका तरसा डारत हस।
छत्तीसगढ़िया किसान ला भगवन, तै काबर भूखा मारत हस।।3।।

खेत मा करवाही लहूटे, तरिया नरवा सुक्खा परगे।
पानी के अगोरा मा भगवान, कतको जीव जन्तु हा मरगे।
सबो जगा तो जम के बरसे,फेर इहें सुखा कार पारत हस।
छत्तीसगढ़िया किसान ला भगवन, तै काबर भूखा मारत हस।।4।।

रचनाकार:- गुमान प्रसाद साहू
ग्राम:- समोदा (महानदी),आरंग
जिला:- रायपुर, छत्तीसगढ़
मोबा:- 9977213968,9977313968
Gpsahu2.blogspot.com

"(25)ये कइसन बरसात हे"

।ये कइसन बरसात हे।। 

पानी तो गिरत नइहे, भारी गरमी बस जनात हे।
खेत खार हा सुक्खा परगे,ये कइसन बरसात हे। ।

आषाढ़ हर तो सुक्खा बुलकगे, सावन घलो सिरागे।
भादो लगिस ता बादर बैरी हा, नइ जाने कहाँ लुकागे।
छत्तीसगढ़ के किसनहा मन ला, ये कइसन तरपात हे।
ये कइसन बरसात हे संगी, ये कइसन बरसात हे।।1।।

जइसे तइसे ता होइस बोनी, लाख उपाय ला करके।
फेर पानी के नइ बरसे ले, गरमी ले सब मरगे जरके।
खेत खार करवाही लहूटे, अकाल हर अब समात हे।
ये कइसन बरसात हे संगी, ये कइसन बरसात हे।।2।।

कइसे होही हमर गुजारा, खाना कहाँ ले लाबो।
अकाल के मार ले सब्बो, भूखा लाँघन मर जाबो

अइसन अकाल मा अब का होही, तेकर चिंता हा कल्पात हे।
ये कइसन बरसात हे संगी,ये कइसन बरसात हे।।3।।

कतको रोटी बर करही पलायन, कतको हा भूखन मरही।
पानी हर तो गिरत नइहे ता, किसनहा मन काय करही।
सन् 1995 के सुरता हर,रहि रहि फेर याद आत हे।
ये कइसन बरसात हे संगी, ये कइसन बरसात हे।।4।। 

रचना:- गुमान प्रसाद साहू
ग्राम:- समोदा (महानदी),आरंग
जिला:- रायपुर, छत्तीसगढ़
मोबा:- 9977213968,9977313968
Gpsahu2.blogspot.com

(46)"कब बरसबे तैंहा रे बादर"

।कब बरसबे तैंहा रे बादर।।

कब बरसबे तैंहा रे बादर,हमरो गाँव के धनहा मा।
तोर अगोरा करत बैठे हे, मूड़ धरे किसनहा मन।।

भरे बरसात मा लुकागे हावस, तैंहर कहाँ जाके।
हमर गाँव मा आवत नइ हस, थोरकुन काबर झाँके।।

तोर अगोरा मा सुखावत हावै,जम्मो धनहा डोली।
करत हवस काबर तैंहर, हमर ले आँख मिचौली।।

घुमड़ घुमड़ के आके बादर, जल काबर नइ बरसात हस।
टुहूँ दिखाके किसनहा मन ला, काबर अतका तरसात हस।।

सुरूज उगलत हे आगी जेठ कस,गरमी बाढ़त जात हे।
भरे चम्मास मा भोंमरा जरत हे, ये कइसन बरसात हे।।

रचना:- गुमान प्रसाद साहू,
ग्राम:- समोदा(महानदी),आरंग
जिला:- रायपुर, छत्तीसगढ़
मोबा- 9977213968,9977313968
Gpsahu2.blogspot.com